Saturday, December 11, 2010

आसाब पर सवार औरत

हबूदे -आदम से ही औरत आदमी के आसाब पर सवार रही है. रोम राज्यकाल के दौरान आदमी वक़्त बे वक़्त किसी  भी औरत को अपनी शेह्वत का शिकार बना सकता था. उस समय ऐसा फैसला लीया गया कि गर कोई भी मर्द किसी भी औरत से जिस्मानी ताल्लुकात रखना चाहता है तोह उसे उसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी. इस तरह औरत के हकों को सुरक्षित कीया गया और उन्हें शोषण से भी बचाया गया. इस्मतफरोशी सबसे प्राचीन पेशा है. आज भी औरत आदमी के आसाब पर उतनी ही सक्रीय तौर से छाई हुई है. फर्क  सिर्फ इतना है की आज अधिकतर आदम चखले कोठों के नाम से तौबा करतें हैं और मोहब्बत -दीवानगी का दावा. और फिर  उसी एहसास के आगोश में, मासूमियत का चोगा ओढ़े  मंज़िले-शेह्वत तक पहुचंते हैं जिसे वे मोहब्बत समझते हैं.
"रूहानी मोहब्बत", यह हर्फ़ मैंने हसन मंटो साहब की एक कहानी से इख़्तियार कीया है. वाकई बेहद खूबसूरत शब्द . जैसे आदमी का  प्रत्यक्ष रूप से होना  महत्त्व रखता ही न हो. गोया आफताब की रौशनी सा, जिसे हम छू नहीं सकते, चूम नहीं सकते, अपने आगोश में  ले इज़हार नहीं कर सकते, परन्तु उसका प्रकाश जो हमे सदेव बल देता है, बेनज़री  को नज़र करता, अँधेरे से निजात दिलाता है हूबहू उस रूहानी मोहब्बत के समान है जहाँ औरत/आदमी का प्रत्यक्ष रूप से मौजूद होना ज़रूरी नहीं.

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